राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

राजस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था

राजस्थान भारतीय संघ का एक राज्य है, जहाँ अन्य भारतीय राज्यों की तरह संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था है।

सम्पूर्ण राज व्यवस्था संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका द्वारा संचालित की जाती है।

राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था अथवा लोक प्रशासन का उद्देष्य राज्य के बहुमुखी विकास के साथ-साथ जनता के हितों की रक्षा करना तथा शांति एवं व्यवस्था हेतु कानून का शासन करना है।

राजस्थान का वर्तमान स्वरुप 1 नवंबर 1956 को अस्तित्व में आया था ।

राजस्थान के पहले आम चुनाव जनवरी 1952 में हुए थे  एवं पहले आम चुनाव में विधानसभा में कुल 160 सीटे थी ।

राज्य के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री – हीरा लाल शाश्त्री (1949-1951)

राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री – टीकाराम पालीवाल (1952).

राजस्थान  के प्रथम राजयपाल गुरुमुख निहाल सिंह थे ।

– 3. राजस्थान राज्य की कार्यपालिका

हमारे देश में संघ एवं राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय शासन प्रणाली को अपनाया गया है। इस प्रणाली में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका में घनिष्ठ सहयोगी संबंध रहते हैं।

संविधान के अनुच्छेद 154 के अनुसार हमारे राज्य की कार्यपालिका शक्तियाँ राज्यपाल में निहित है तथा उनका प्रयोग वह भी सामान्यतः राष्ट्रपति की भाँति मंत्रिमण्डल के परामर्षानुसार करता है।

संसदीय शासन प्रणाली में दो प्रकार की कार्यपालिका होती है –

  1. नाममात्र की कार्यपालिका जिसके अंतर्गत राज्यपाल वैधानिक शासक होता है ।
  2. मंत्रिमंडल राज्य की वास्तविक कार्यपालिका होती है । मंत्रिमंडल का प्रधान मुखमंत्री होता है ।

कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।

राज्यपाल की नियुक्ति सामान्यतः 5 वर्ष हेतु की जाती है, किन्तु राष्ट्रपति उससे पूर्व भी राज्यपाल को हटा सकता है। राज्यपाल पद हेतु कुछ योग्यतायें वांछनीय है जैसे वह भारत का नागरिक हो, 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।

मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद अर्थात् वास्तविक कार्यपालिका- देश में जो कार्य प्रधानमंत्री के है लगभग उसी प्रकार की भूमिका तथा स्थान राज्य में मुख्यमंत्री का होता है। संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को परामर्ष देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी

जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।

–  सामान्यतः मुख्यमंत्री पद हेतु पृथक से योग्यताएं नहीं रखी है, लेकिन राज्यपाल ऐसे व्यक्ति को ही मुख्यमंत्री की शपथ दिलाता है, जो विधानसभा में बहुमत दल का नेता हो, तथा वह विधान सभा का सदस्य हो, यदि वह विधान सभा का सदस्य नहीं है, तो

6 माह में उसे सदस्यता प्राप्त करनी होती है।

सम्पूर्ण राज्य का शासन, प्रशासन सर्वो च्च रूप में मुख्यमंत्री द्वारा ही चलता है। मुख्यमंत्री अपने दल के कार्यक्रम, नीतियों को जन आकांक्षाओं के अनुरूप लागू करने हेतु कई कार्य करते है। जिसमें अपनी मंत्रिपरिषद का गठन करना, मंत्रियों को विभाग बांटना,

राज्य प्रशासन एवं व्यवस्था सम्बन्धी मंत्रिपरिषद के निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराना एवं आपसी समन्वय रखना |

राजस्थान में कुल 200 विधानसभा, 25 लोकसभा एवं 10 राज्यसभा की सीटें हैं

– 4. राजस्थान राज्य में व्यवस्थापिका

व्यवस्थापिका भारतीय जनतंत्र के तीन अंगों में से एक है। अन्य दो अंग हैं – कार्यपालिका और न्यायपालिका।

राजस्थान भारत का एक राज्य है जहाँ एक सदनीय व्यवस्थापिका का प्रावधान है, जिसे विधानसभा कहा जाता है

राजस्थान में विधानसभा की कुल 200 सीटें हैं ।

भारत में कुल 7 राज्य है जहाँ द्विसदनीय व्यवस्थापिका है अर्थार्त विधानसभा एवं विधान परिषद दोनों हैं ।

विधान परिषद वाले 7 राज्य हैं जम्मू कश्मीर, आँध्रप्रदेश,तेलांगना महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक एवं उत्तर प्रदेश, राजस्थान  और असम भी विधान परिषद की मांग के लिए प्रयासरत है ।

केंद्र स्तर पर व्यवस्थापिका संसद को कहते हैं जिसके दो सदन हैं – उच्चसदन राज्यसभा और निम्नसदन लोकसभा। राज्यसभा में 250 सदस्य होते हैं जबकि लोकसभा में 552 हैं। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव, अप्रत्यक्ष विधि से ६ वर्षों के लिये होता है,

जबकि लोकसभा के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष विधि से होता है

राजस्थान के प्रथम मनोनीत मुख्यमंत्री हीरा लाल शाश्त्री (1949) थे ।

राजस्थान के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल (1952) थे ।

राजस्थान की प्रथम महिला मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे थी ।

राजस्थान के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष श्री नरोत्तम जोशी थे ।

राजस्थान की प्रथम महिला विधानसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा सिंह थी

– 5. राजस्थान राज्य में न्यायपालिका

भारत की न्यायपालिका एकीकृत प्रकार की है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय स्थापित है। उच्चतम न्यायालय को अन्तिम न्याय-निर्णयन का अधिकार प्राप्त है। प्रत्येक राज्य या कुछ समूह पर उच्च न्यायालय गठित है। उच्च न्यायालय के तहत श्रेणीबद्ध

अधीनस्थ न्यायालय हैं।

भारत में 24 उच्च न्यायालय हैं, जिनके अधिकार और उत्तरदायित्व सर्वोच्च न्यायालय की अपेक्षा सीमित हैं।

दिल्ली एकमात्र ऐसा केंद्र शासित प्रदेश है जिसके पास उच्च न्यायालय है। अन्य छह केंद्र शासित प्रदेश विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों के तहत आते हैं।

न्यायपालिका और व्यवस्थापिका के परस्पर मतभेद या विवाद का सुलह राष्ट्रपति करता है।

राजस्थान उच्च न्यायालय भारत के राजस्थान प्रान्त का न्यायालय हैं। इसका मुख्यालय जोधपुर मे हैं।

यह 21 जून 1949 को राजस्थान उच्च न्यायालय अध्यादेश, 1949 के अंतर्गत स्थापित किया गया। इसकी एक खण्डपीट जयपुर में भी स्थित है!

राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर खंडपीठ की स्थापन 31 जनवरी 1977 में की गयी थी

–  प्रत्येक राज्य न्यायिक जिलों में विभाजित है। इनका प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीश होता है। जिला एवं सत्र न्यायालय उस क्षेत्र की सबसे बड़ी अदालत होती है और सभी मामलों की सुनवाई करने में सक्षम होती है, उन मामलों में भी जिनमें मौत की

सजा तक सुनाई जा सकती है।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश जिले का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी होता है। उसके तहत दीवानी क्षेत्र की अदालतें होती हैं जिन्हें अलग-अलग राज्यों में मुंसिफ, उप न्यायाधीश, दीवानी न्यायाधीश आदि नाम दिए जाते हैं।

इसी तरह आपराधिक प्रकृति के मामलों के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और प्रथम तथा द्वितीय श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट आदि होते हैं।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति देश के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उच्च न्यायालयों के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्त प्रक्रिया वही है सिवा इस बात के कि न्यायाधीशों के नियुक्ति की

सिफारिश संबद्ध उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश करते हैं।

न्यायाधीश बनने की अर्हता यह है कि उसे भारत का नागरिक होना चाहिए, देश में किसी न्यायिक पद पर दस वर्ष का अनुभव होना चाहिए या वह किसी उच्च न्यायालय या इस श्रेणी की दो अदालतों में इतने समय तक वकील के रूप में प्रैक्टिस कर चुका हो।

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